sweetie radhika radhey-radhey

Friday, August 19, 2011

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है


- स्वीटराधिका राधे-राधे
SWEETIE

आग्रहग्रस्त दृष्टिकोण हर बात में मीन-मेख निकालता है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक (जन्म 23 जुलाई 1856, मृत्यु 1 अगस्त 1920) के विचारों पर भी पूर्वाग्रहप्रिय लोगों ने मीन-मेख की लाठियां भांजीं। जब तिलक ने कहा कि 'समाज-सुधार से पहले स्वराज की सोचो।' तो इसे तिलक-विरोधियों ने रूढ़िवादी वक्तव्य बतलाया। 

परिणामस्वरूप तिलक पर आलोचनाओं के अंगारे बरसाए गए। आग्रहग्रस्त लोगों ने तिलक को समाज-सुधारों का विरोधी कहा। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत थी। तिलक भी समाज-सुधार चाहते थे, लेकिन सलीके से। वैसे भी यह एक सनातन सत्य है कि विवेकपूर्वक और योजनाबद्ध ढंग से किया गया कार्य सफलता का रंग जमा देता है। सलीके से की गई कोशिश सफलता की सौगात देती है। 

यही कारण है कि तिलक ने समाज-सुधार के लिए एक निश्चित कार्ययोजना और उसके व्यवस्थित क्रियान्वयन की बात पर जोर दिया। वैसे भी कहावत है कि 'जल्दी का काम शैतान का।' कोई भी सुधार ताबड़तोड़ नहीं होता और होना भी नहीं चाहिए। तिलक-दर्शन के अध्येता के नाते मेरा मौलिक मत है कि समाज-सुधार किसी सड़क के उस 'पेंचवर्क' या 'मरम्मत' की तरह नहीं होना चाहिए जो किसी वीवीआईपी के आगमन पर किया जाता है और कुछ दिनों बाद ही पेंचवर्क का दम निकल जाता है।

अपितु समाज-सुधार उस हनुमानजी द्वारा लाई गई संजीवनी की तरह होना चाहिए जिसको सुंघाने से लक्ष्मण की मूर्च्छा समाप्त हो और स्थायी रूप से दम वापस आ जाए। लोकमान्य तिलक इसीलिए सलीके से, सुव्यवस्थित तरीके से समाज-सुधार चाहते थे जो स्थायी हो तथा जिससे समाज की 'दशा और दिशा' बदले। अगर तिलक समाज-सुधारों के विरोधी होते तो वे कभी भी आगरकर तथा चिपलूणकर के साथ मिलकर न्यू इंग्लिश स्कूल की 1 जनवरी 1880 में स्थापना नहीं करते। 

तिलक द्वारा अपने साथियों के साथ स्थापित किया गया यह स्कूल ही आगे चलकर 'डेकन एजुकेशन सोसायटी' के रूप में विकसित हुआ। यही नहीं तिलक ने बाद में आगरकर और आष्टे के सहयोग से फर्ग्यूसन कॉलेज खोल दिया था। 

शिक्षण-संस्थाएं प्रारंभ करने और कॉलेज खोलने की तिलक की तड़प से पता चलता है कि वे शिक्षा को ऐसा शस्त्र मानते थे जो विकारों को ध्वस्त करके सुधारों का पथ प्रशस्त करती है। लेकिन समाज-सुधार के लिए स्वराज आवश्यक है। यही कारण है कि तिलक ने समाज-सुधार के लिए स्वराज्य की पैरवी की। चूंकि तिलक ने समाज-सुधार से पहले स्वराज की बात की इसलिए विरोधियों ने आसमान सिर पर उठा लिया। जबकि वास्तविकता यह है कि समाज-सुधार के वाहन के लिए स्वराज की सड़क जरूरी है।

फोर्थ डिग्री कविता का फॉर्मूला


स्वीटराधिका राधे-राधे
SWEETIE
सारा पुलिस महकमा परेशान-हलकान था। अपराधी इतने शातिर और चट्टान की तरह मजबूत हो गए थे कि उन्हें कितना ही मारो-कूटो-पीटो, अपने जुर्म को उगलते ही नहीं थे। अपराधियों में अचानक आए इस परिवर्तन से कांस्टेबल से लगाकर होम मिनिस्टर तक आश्चर्यचकित थे। आखिर सभी अपराधियों का एकाएक शरीफ हो जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था। पुलिस का चिर-परिचित फॉर्मूला, थर्ड डिग्री फॉर्मूला भी छोटे-छोटे अपराधियों के सामने ही ऐसे औंधे मुँह धराशायी हुआ कि जीरो डिग्री से भी बदतर साबित हुआ। सरकार को भी सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या न करे। कुल मिलाकर यह मुद्दा पूरे देश के लिए अहम मुद्दा बन गया था।

जब चिल्ल-पौं मची तो हमेशा की तरह मामले से पीछा छुड़ाने के लिए आयोग गठित कर दिया गया। दस साल बाद आई आयोग की रिपोर्ट में अपराधियों से राज उगलवाने के दस रामबाण अचूक फॉर्मूले सुझाए गए थे। आयोग की रिपोर्ट से नेता, अभिनेता, जनता सभी इसलिए भी निश्चिंत और संतुष्ट थे कि पूरे एक साल में जब एक फॉर्मूला खोजा गया है तो वह रामबाण के साथ ही श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह भी होगा। 

उत्साहित पुलिस ने दृढ़ इच्छाशक्ति और पूरे शारीरिक व आत्मबल से आयोग के फॉर्मूलों को अपराधियों पर प्रयोग किया। पूरी मुस्तैदी के साथ क्रियान्वित किए गए एक से दस तक के फॉर्मूलों का अपराधियों पर ऐसा असर हुआ जैसे वे टीवी पर राजू श्रीवास्तव का लॉफ्टर चैलेंज शो देख रहे हों। हताश होकर सरकार ने अपना माथा ही नहीं हाथ, पैर, आँख, कान, जुबान सभी पीट लिए।

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एक कस्बे के थाने के टीआई सा. अपने ऑफिस में थके-हारे बैठे थे। दरअसल, उन्होंने एक शातिर और पुराने जिलाबदर अपराधी को बमुश्किल पकड़ा था और उसकी डेढ़ घंटे तक की गई धुनाई से लस्त-पस्त हो गए थे। टीआई साहब ने संतरी को कड़क मीठी चाय लाने का ऑर्डर मारा। इस देश के सौभाग्य से टीआई साहब कवि भी थे। संतरी ने जैसे ही गरमा-गरम चाय टेबल पर रखी, उन्होंने गटागट हलक में उड़ेल ली। मुँह में जर्दे का गुटका दबाते ही उनके शरीर से टीआई का पद तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट हो गया और उन्होंने कवि के पद पर अपनी आमद दर्ज करा दी।

टीआई साहब सर्वोतोन्मुखी प्रतिभा के धनी कवि थे। सभी रसों की काव्य-सर्जना में उनका समान रूप से अधिकार था। कवि के पद पर ज्वाइनिंग रिपोर्ट देने के बाद उन्होंने आठ-दस कविताएँ लिख डालीं। टीआई साहब कविता लिखने के बाद ऐसे खुश, जैसे उन्हें एसपी बना दिया गया हो। थोकबंद कविताएँ लिखने के बाद आम कवियों की तरह उनके मन में उन्हें किसी को सुनाने की लहरें उठने लगीं। थाने के पूरे स्टाफ को तो वो अपनी कविताओं से बरसों से बोर कर रहे थे। टीआई ने सोचा, इन ताजी रचनाओं को किसी श्रोता को तुरंत सुनाना जरूरी है नहीं तो ये बासी हो जाएँगी।

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काफी देर के चिंतन-मनन के बाद सुयोग्य श्रोता की तलाश में उनका मन थाने में बंद उस अपराधी की ओर जा अटका, जिसकी उन्होंने धुनाई की थी। साला! मेरी कविता सुनेगा तो झक मारकर दाद भी देगा और ताली भी बजाएगा। टीआई साहब ने लॉकअप का ताला खुलवाया और रचनाओं सहित अंदर जा धमके। सहमा अपराधी खड़ा हो गया। टीआई साहब बोले! बंधु! कुछ ताजा कविताएँ पेश हैं। 

मगर यह क्या, अपराधी जैसे-तैसे तीन कविताएँ झेलने के बाद ही लाइन पर आ गया और बोला बस! बस!! टीआई साहब मुझे चौथी कविता मत सुनाइए। मैं आपको सब कुछ सच-सच बताता हूँ। बेचारे अपराधी ने फटाफट जुर्म का इकबाल कर लिया। फिर क्या था... टीआई साहब की फोर्थ डिग्री कविता का फॉर्मूला उन सभी थानों में लागू कर दिया गया, जहाँ पदस्थ टीआई होने के साथ ही कवि भी थे। अब सरकार नए थानेदार की भर्ती हेतु अनिवार्य योग्यता में कवि होना जरूरी कर रही है। कविता अपराधियों पर भी असर करती है, ये लोगों ने पहली बार जाना।  

लड़के-लड़कियों की अलग पढ़ाई


SWEETIE RADHIKA RADHEY-RADHEY  *
अमेरिका में अब फिर से लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग क्लासरूम लोकप्रिय हो रहे हैं। नए शोध में पाया गया है कि अलग-अलग रखने पर लड़के और लड़कियाँ न केवल आराम से खाते हैं, बल्कि पढ़ाई और आदतों पर भी अच्छा असर हुआ।

80 से 90 के दशक में भारत में को एजुकेशन यानी लड़के-लड़कियों के लिए एक साथ पढ़ाई इतनी लोकप्रिय हुई कि यह फैशन में तब्दील हो गई। अब पटरी फिर पुराने दिनों कि ओर लौट रही है क्योंकि शिक्षाविदों को समझ में आ रहा है कि अलग-अलग रखने पर लड़के और लड़कियों में काफी अच्छे बदलाव देखे गए हैं।

अमेरिका के कैंसास सिटी के तीन स्कूलों में छात्रों के बीच दुर्व्यव्हार को कम करने के लिए लड़के और लड़कियों को अलग-अलग लंच देना शुरू किया गया है। नतीजा सामने आया कि लड़के और लड़कियों दोनों की खाने की आदतें सुधरी। कैंसास का मिडिल स्कूल द विषेटे में 11 से 14 साल के लड़के-लड़कियों के लिए अब खाना अलग-अलग होता है। 

छात्रों के बीच छेड़खानी कम करने के लिए यह कदम उठाया गया है। प्लेजेंट वैली मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक माइकल आर्किबेक कहते हैं, 'लड़कियों को यह बहुत पसंद आ रहा है क्योंकि लड़कों के बगैर उनके पास अपने लिए समय होता है और लड़के भी लड़कियों को रिझाने के लिए अतिशयोक्ति नहीं करते। मुझे लगता है कि इस उम्र के लिए एकदम सही तरीका है।' 

लेकिन प्रधानाध्यापक को सबसे अच्छी बात तो यह लग रही है कि वह बच्चे अपना खाना पूरा खत्म कर रहे हैं। इसका मतलब कि खाना फेंका नहीं जाता और बच्चे भूखे पेट पढ़ाई नहीं करते। 'मुझे विश्वास ही नहीं होता कि इतने बच्चे अब खाना खा रहे हैं।' 

वहीं विषेटे के ट्रूसडेल मिडिल स्कूल में पिछले दो साल से लड़के और लड़कियों के लिए दोपहर का भोजन अलग-अलग होता है। प्रिंसिपल जेनिफर सिनक्लेर कहती हैं कि इसका अच्छा असर बाद में भी इन बच्चों पर देखा जा सकता है। सिनक्लेर कहती हैं कि बच्चों को यह पसंद भी आ रहा है क्योंकि हाल ही में जब साथ में खाने का प्रस्ताव रखा गया तो बच्चों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। 

कैंसास के शिक्षा विभाग के प्रवक्ता का कहना है कि सिर्फ विषेटे में ही इस तरह के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। वैसे अमेरिका में लड़के और लड़कियों की अलग पढ़ाई धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है क्योंकि सामने आया है कि ऐसा करने से बच्चे पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देते हैं और उनके सामाजिक व्यव्हार में अच्छा बदलाव आता है। 
जनवरी 2011 में कम से कम 524 अमेरिकी पब्लिक स्कूल ऐसे थे जहाँ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग कमरे थे। जबकि 2002 में ऐसे एक दर्जन स्कूल भी नहीं थे।

Wednesday, August 17, 2011

बिनु हिंदुत्व भारत मृत सी काया . मृत है देश ,मृत जन-मानष चीन्हो !



बिनु हिंदुत्व बौरी भई जनता 
राष्ट्र अखंड बिभाजन कीनो 
पाकिस्तान सो शत्रु कीन्हो 
लूट मचाई शेष देश में 
पंगु अखंड मंडल करि दीन्हो  
स्वाभिमान को भूल गए सब 
पिट-पिट कर लालच मन लीन्हो 
राम-श्याम-शिव छोड़ के बन्धु 
कैसो भ्रम धर्म-निरपेक्ष चीन्हो 
सत्तासीन लुटेरे डाकू 
तौ कैसे होय सुख से जीनो 
गुजरात प्रान्त समृद्धि सब सम्मुख 
हिंदुत्व ही सबको सुख दीनो  
जाति-आरक्षण तृष्णा स्वारथ 
मृग मरीचिका न कोई सुख कीन्हो 
एकता हिन्दू मात्र की होवे 
सत्य-वचन मम तव ही भलो होन्हो 
"स्वीट राधिका " हेरत-टेरत 
हिंदुत्व ही या देश को गहनो 
बिनु हिंदुत्व ये मृत सी काया 
मृत है देश मृत जन-मानष चीन्हो  


जयहिंदुत्व -जयभारत    

Friday, August 5, 2011

वन्दे मातरम !


बिट्रिश राज समाप्त हुआ था अभी स्वतंत्रता वाकी है !
गुंडे-बदमाशों-चोरों से कराना सिंघासन खाली है !!
स्वराज्य का सपना सच होने में देर लगेगी न कोई अब  !
लोकमान्य का कहना होगा मिलकर तिलक करेंगे सब !!
टूटे हुए भाग देश के पाने होंगे पुनः हमें !
तव ही प्यारा देश हमारा होगा  पूर्ण स्वतंत्र सच में !!
सच्ची श्रृद्धा वीर-बलिदानी शहीदों के चरणों में यही !
भ्रष्टाचार मिटे भारत से सुखी हों भारतवासी सभी !!
जगदगुरु (भारत धर्मं-भारत राष्ट्र) को पुनः इस जग में वोही पद देना होगा !
कर्तव्यनिष्ठ -धर्मसेवक - वीर और चारित्रिक भारतवासी बनना होगा !!
वन्देमातरम जयकारों में हम शंखनाद करके महा !
पुनि समर महाभारत सृजा पायें सत्य भारत को यहाँ !!

हारेंगे पुनि शकुनी-दुर्योधन एक न चलेही कायरों की !
पार्थ-सारथि के निर्देशन जय गीता ज्ञान विचारों की !!
पार्थ सदृश पुनि भारतमाता की रक्षा करनी होगी !
सत्य-ज्ञान-भक्ति केशव से सीख हमें लेनी होगी !!
धर्मं ध्वजा हम लहरायेंगे स्वाभिमान के अंचल में  !
जय हिंदुत्व-जय भारत कहके पुलकित होंगे जग भर में !!

भारत माता की जय ! वन्दे मातरम !








परन्तु दुर्भाग्य से हमारे अपने भारत वासियों की कुत्सित लालच-स्वार्थों के कारण सरकार-नेता तुष्टिकरण के द्वारा भारत धर्मं-भारत राष्ट्र विरोधी शक्तियों को बढ़ावा देकर सच्चे राष्ट्रभक्तों-वीर-बलिदानी सेवकों का अपमान कर भ्रष्टाचार रूपी गर्त में देश को धकेल रहे  है .. 
भाषा-क्षेत्र-जाति-संप्रदाय में महान आर्य समुदाय को बाँट कर आपस में लड़ाया जा रहा है ! 
एक न होने देकर विधर्मी-बिध्वंसकारी आतंकी  शक्तियों को पुष्ट किया जा रहा है ! 
मित्रो, हमें आवश्यकता है एकता की सम्पूर्ण हिन्दू समाज की परमश्रेय दाई एकता की ..
जिसके छत्र-छाया में हम सहज ही राष्ट्र को एक अच्छी चारित्रिक -राष्ट्र-धर्म सेवी सरकार प्रदान कर अपनी एवं राष्ट्र की उन्नति करें ! 
जय हिंद !!

Friday, July 29, 2011

आदर्श भारत


हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !


हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे !!


एक सैनिक मित्र के सन्देश हम रात को जागते हें देश की रक्षा के लिए 


जो अत्यंत ही श्रेष्ठ एवं भारत व भारत वासियों की सेवा में है को पढ़ मैने उस सैनिक मित्र को लिखा -


हम प्रति-पल जागते हें धर्मं-राष्ट्र -समाज एवं आत्म सुधार -उद्धार- रक्षा-उन्नति के लिए 

जय-जय सियाराम जी !


राधे-राधे-श्याम !

श्री हरी !


नमः पार्वती पत्ये हर-हर महादेव 

हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !


हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे !!



मित्रो यहाँ मेंने आत्म का विशेष रूप से उल्लेख किया है क्योंकि जब तक हम स्वयं में नहीं सुधार करेंगे तव तक दूसरों से सुधार की अपेक्षा कैसे ?
तथा सुधार किसी भी उन्नति के लिए परमावश्यक है , चाहे वहां राष्ट्र-समाज-धर्म-व्यक्तिगत कोई भी हो ,,
हमें समय-समय पर समय के सापेक्ष परिवतन की परमावश्यकता है ,, जिन समाज-राष्ट्र-धर्म एवं व्यक्ति में सुधार एवं सुधारकों की कमी है वे प्राय गतिहीन-मूल्यहीन मृतक समान हैं !
सौभाग्य से मेरा महान भारत देश-संस्कृति एवं सनातन धर्म जन कल्याण हेतु सुधारों के लिए सदैव तत्पर हैं 
यहाँ संख्या बढ़ने की जेहाद-क्रुसेड या अन्य कोई संवेदन हीन स्वार्थ युक्त आतुरता नहीं यहाँ सदैव सर्वश्रेष्ठ जन-कल्याण कारी राम-राज्य की अभिलाषा है ,, यहाँ मुरली मनोहर भगवान श्री कृष्ण की मधुर-शांति युक्त मुरली आस्वादन की  प्रार्थनाएं हैं ! हमारी महान संस्कृति-विरासत "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की सच्ची एवं मानवतावादी से भी ऊपर चराचर के कल्याण हेतु हमें शिक्षित कर हमें जीवन लाभ की दिशा सुझाती है !
अतः मित्रो वर्तमान में अबिलम्ब ६० बर्ष पुराने संविधान को यथा योग्य संशोधित कर देश एवं देशवासियों को सच्चे लाभ देने चाहिए ! एक भाषा (राष्ट्र भाषा संस्कृत) , एक कानून (धर्म के नाम पर कोई दूसरा कानून न रख कर सच्ची धर्म निरपेक्षता तथा एक देश एक कानून के अंतर्गत सम्पूर्ण भारत राष्ट्र में एक नियम-संबिधान रख सच्ची राष्ट्र निष्ठां .. वर्तमान में कश्मीर में दूसरा संविधान भी लागू होता है जो राष्ट्र निष्ठां पर कुठाराघात है  ), राष्ट्र धर्म ( सनातन धर्म के विना इस भारत राष्ट्र की पहचान सदैव ही अधूरी है ),एवं भ्रष्टाचार निवारण के लिए अमेरिकेन संविधान सदृश राष्ट्रपति चुनाव एवं अधिकार के साथ-साथ कोई और अन्य सर्व सम्मत योजना ! जैसे उपाय कर देश को शशक्त-सम्माननीय बनाना ही होगा - इसी प्रकार धार्मिक एवं अध्यात्मिक सेवा कार्यों से निज स्वार्थ-व्यापार को लोगों को ठगने की योजना वद्ध ठगी को  रोकने हेतु भी बहुत से उपाय धार्मिक-अध्यात्मिक संत-भक्त-आचार्यों के सुझावों से करने ही होंगे !मुझे विश्वास है की उपरोक्त राष्ट्र एवं धर्म के सेवा सुधारों से सभी राष्ट्र वासियों को मिलने वाले अवसरों की संख्या में वृद्धि होगी फल स्वरुप सभी देशवासी  स्व सुधार कर उन्नति प्राप्त कर धर्मं -समाज एवं राष्ट्र की उन्नति करेंगे !

जय हिंद !! जय भारत !!

Thursday, July 28, 2011

सेवक स्वामी सखा सिय पी के ! हित निरुपधि सब विधि तुलसी के !!


  • lord Rama has said someone who is my devotee but insulting lord Shiva (saying dummy god )to lord shiva ... 
  • lord Rama never like to look for him... 
  • so how is such person called him/her self a devotee of lord Krishna/Rama ...?
  • lord Shiva is the top most vaishnava ... 
  • as it- "vaishnavanam yatha shambhuh "
  • without Shiva worship how can be a Vaishnava?

शिव द्रोही मम दास कहावा ! सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं  भावा !!




जय श्री राधेश्याम -
जय श्री सीताराम -
जय-जय श्री गौरीशंकर भगवान -
जय-जय श्री लक्ष्मीनारायण जी !!
परस्पर दोऊ चकोर दोऊ चंदा !!

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज भगवान शंकर एवं भगवान राम के आपस में सम्बन्ध पर 
विश्व कल्याणकारी परम आदरणीय श्री भगवदभक्ति प्रदायक सुर-नर-मुनि- सेवित वेद-शास्त्र-पूरण-ग्रन्थ सम्मत श्री मद रामचरितमानस में लिख रहे हैं !
सेवक स्वामी सखा सिय पी के !  हित निरुपधि सब विधि तुलसी के !!
अर्थात भगवान शंकर - भगवान श्री राम के सेवक (दास) -स्वामी (इष्ट) -सखा (मित्र) हैं ! जोकि सहज ही मेरे (श्री तुलसी दास जी के ) एवं सभी भक्तों के सभी प्रकार  के हित साधक -कल्याण करने वाले हैं !
इसी प्रकार माता सती को भगवान विश्वनाथ प्रभु श्री राम जी के परिचय में कहते हैं !
सोई मम इष्ट देव रघुवीरा ! सेवत जाहि सदा मुनि धीरा !!
अर्थात - श्री रघुवीर (राम जी) मेरे (भगवान शंकर के ) इष्टदेव हैं जिन्हें सभी ऋषि-मुनि -संत-भक्त भी अपने इष्टदेव मानते हैं (श्री राम नाम-श्री राम चरित-श्री राम धाम का सेवन करते हैं )
भगवान श्री राम के दशरथ सुत के रूप में जन्मने पर सभी कहते हैं की "कोऊ नहीं इन्ह सम शिव आराधे "
अर्थात श्री दशरथ जी को श्री राम जी पुत्र रूप में भगवान शंकर के आशीर्वाद-कृपा से ही मिले हैं !
इसी प्रकार माता सीता जी भी श्री राम जी को पति रूप में प्राप्त करने हेतु जग-जननी माता अम्बिका की पूजा करा मनोरथ मांगती हैं ! और माता भवानी के आशीर्वाद श्री राम प्राप्ति का  मिलने पर प्रफुल्लित हो जाती हैं !
यथा-"सुन सिय सत्य असीस हमारी ! पूजहिं मनकामना तुम्हारी !!"
इसी प्रकार भगवान श्री हरी भक्त नारद जी को भगवान शंकर का सुझाव न मानने पर ( कि नारद जी आपनी जो कम विजय गाथा मुझे सुना रहे हो कभी श्री हरी के सम्मुख चर्चा होने पर भी न गाना ! को न मानकर अपने को श्री हरी का अनन्य भक्त मान अपनी विजय गाथा श्री हरी को सुनना तथा साथ-साथ यह भी बताना देखलो  शंकर जी मुझे आपको न बताने की कह रहे थे  ! पर मैने आपको बोल दिया क्योंकि आप ही मेरे अपने  हो ) नारद मोह प्रसंग में , नारद जी को पाप मुक्ति हेतु शंकर जी की आराधना को बोलते हैं ! 
"जाहु जपहु शंकर शत नामा " तथा बोलते हैं -

शिव द्रोही मम दास कहावा !  सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं   भावा !!