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Friday, August 19, 2011

एक स्त्री का स्वप्न और मर्द की सोच


SWEETIE
'मैं सोचती हूँ एक वक्त ऐसा भी आएगा, जब आदमी औरत के पीछे खड़ा नजर आएगा। ट्रक पर सामान लादने से लेकर हाथी का महावत बनने तक हर काम में औरतों का प्रभुत्व होना चाहिए। आदमी को घर में रुककर खाना बनाना चाहिए और जब स्त्रियाँ काम से लौटें तो उन्हें गोद में बच्चे लिए उनके लिए घर के दरवाजे खोलने चाहिए।' 
(केरल में स्थानीय निकायों के चुनावों से एक दिन पहले एक स्थानीय अखबार में एक महिला के उद्गार) 

जाहिर है कि किसी भी स्त्री का यह एक स्वप्न हो सकता है कि वह पुरुष के बराबर ही नहीं, उससे आगे खड़ी दिखाई दे। समाज में ऐसी कौन-सी स्त्री होगी जिसके मन में कभी यह न आया हो कि पुरुष भी वे सारे काम करें जिन्हें स्त्रियों के काम बताकर पुरुष निर्द्वंद्व घूमते फिरते रहते हैं? आखिर घर संभालना और बच्चे पालना सिर्फ स्त्री के ही काम क्यों हों?

केरल की स्त्री का यह स्वप्न नितांत स्वाभाविक और मानवीय है। कोई आश्चर्य नहीं कि यह स्वप्न एक दिन सच भी साबित हो जाए। पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों में पुरुष घर के काम में पूरा हाथ बँटाते हैं। वे बच्चे पालते हैं, उनके डायपर या पोतड़े बदलते हैं, उनके लिए दूध की बोतल तैयार करते हैं और हर जिम्मेदारी निभाते हैं। कुछ देशों में तो पिताओं को भी प्रसूति सरीखा अवकाश मिलता है। 

केरल की एक स्त्री अगर आज अपने लिए ऐसा स्वप्न देख रही है, तो उसके पीछे कुछ कारण हैं। केरल में पंचायतों के चुनाव हो रहे हैं और इन चुनावों में 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। महिलाएँ 50 प्रतिशत से भी ज्यादा सीटों पर जीत कर आएँगी क्योंकि अनेक सामान्य वर्ग की सीटों पर भी उनकी जीत की प्रबल संभावना है। केरल में योजनाओं के मद का एक तिहाई पैसा राज्य सरकार स्थानीय निकायों को उपलब्ध कराती है। 

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स्थानीय निकायों में अपना प्रभुत्व कायम होने के बाद महिलाएँ इस पैसे को खर्च करने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाएँगी। यह सही है कि केरल रातोंरात स्त्रियों के लिए स्वर्ग नहीं बन जाएगा लेकिन इतना जरूर माना जा रहा है कि इससे केरल की आम स्त्री का सशक्तीकरण होगा और समाज में उसे उस तरह के लिंग भेद का सामना नहीं करना पड़ेगा जिसका उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश आदि में आमतौर पर करना पड़ता है। 

इन राज्यों में आज भी कन्याओं को गर्भ में ही मार दिया जाता है। यही कारण है कि इन राज्यों में प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम है। यह अनुपात गड़बड़ाने से समाज में एक अलग तरह का असंतुलन पैदा हो गया है। इसका खामियाजा भी स्त्री जाति को ही भुगतना पड़ रहा है। हरियाणा और पंजाब में स्त्रियों की कमी होने से पिछले वर्षों में स्त्रियों की खरीद-फरोख्त के समाचार भी सुनने में आए थे। यह ठीक है कि समय के साथ समाज में कुछ प्रगतिशील बदलाव भी हुए हैं, लेकिन आज भी अनेक जगह स्त्री को एक वस्तु की तरह देखा और समझा जाता है। 

कृषि आधारित समाजों में प्रायः हर परिवार की कामना पुत्र पाने की होती थी। माना जाता था कि पुत्र से ही वंश आगे चलेगा और खेतिहर कामों आदि में पुत्र ही ज्यादा उपयोगी होगा। यह क्या कम चौंकाने वाली बात है कि भारतीय परंपरा में धन और यश के साथ पुत्र की एषणा या कामना का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। याद नहीं पड़ता कि किसी राजा ने पुत्री की कामना से कोई यज्ञ आदि किया हो। 

अभी हाल ही में मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि मेरे एक परिचित पुत्र की चाह में अपनी पत्नी को लेकर बैंकाक गए थे। उनके पहले से एक लड़की है। थोड़े दिनों बाद उनके लड़का भी हो गया। बताया गया कि उन्होंने बैंकाक के एक अस्पताल में आईवीएफ तकनीक से अपनी पत्नी को गर्भधारण कराया। 

उन्हें कुछ दिन बैंकाक में रहना पड़ा और इस पर लगभग 5 लाख रुपए का खर्च आया। मेरे परिचित एक छोटे-मोटे उद्योगपति हैं मगर आज के युग में भी जब महिलाएँ बड़े-बड़े बिजनेस संभाल रही हैं उन्हें आगे चलकर अपने कारोबार के लिए एक अदद पुत्र ही चाहिए। तो सामंतवादी समाजों के दिन लदने और प्रगति और विकास की रोशनी आने के बावजूद हमारे समाज में पुत्रेषणा कायम है। 

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मुझे आश्चर्य हुआ जब मैंने हाल ही में चीन के बारे में एक समाचार पढ़ा। चीन ने बड़े प्रयत्न से समाजवादी समाज बनाया था। यह अलग बात है कि बाद में उसका विचलन पूंजीवादी रास्ते के रूप में भी देखने को मिला। चीन में एक परिवार-एक संतान की नीति का पालन कराया जाता है क्योंकि राज्य को लगता है कि बढ़ती आबादी को न रोका गया तो एक दिन संसाधनों की कमी हो जाएगी। 

खबर में बताया गया है कि एक गर्भवती चीनी महिला को परिवार कल्याण विभाग जबरदस्ती पकड़ कर ले गए और 8 महीने के उसके शिशु का मारपीट कर गर्भपात करा दिया। इस महिला के पहले से एक संतान थी-नौ बरस की बच्ची। अब वह एक लड़का चाहती थी। चीन में दूसरी औलाद पैदा करने वाले से वैसे ही कई रियायतें छीन ली जाती हैं मगर यहाँ तो राज्य ने जुल्मोसितम की हद ही कर दी। चीन में मीडिया पर सरकार का नियंत्रण है, फिर भी वहाँ के लोग इंटरनेट पर इस घटना का वर्णन पढ़ रहे हैं और उत्तेजित भी हैं। 

जो भी हो यह सवाल अपनी जगह है कि हमारे परिवारों को आज भी लड़का ही क्यों चाहिए? लड़की पैदा करने वाली स्त्री हमारे समाज में आज भी कई बार उपेक्षा और पारिवारिक नफरत का शिकार होती है, जैसे लड़की पैदा करने का दोष उसी का हो। 

तो क्या यह माना जाए कि हमारे सामंतवादी सोच आज भी जिंदा है और प्रगति और विकास की रोशनी खुद पथरा गई है? क्या हमारे यहाँ बड़े-बड़े पदों पर विराजमान स्त्रियों का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व ही है और उनके प्रति समाज के नजरिए में कोई बड़ा गुणात्मक बदलाव नहीं आया है?

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है


- स्वीटराधिका राधे-राधे
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आग्रहग्रस्त दृष्टिकोण हर बात में मीन-मेख निकालता है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक (जन्म 23 जुलाई 1856, मृत्यु 1 अगस्त 1920) के विचारों पर भी पूर्वाग्रहप्रिय लोगों ने मीन-मेख की लाठियां भांजीं। जब तिलक ने कहा कि 'समाज-सुधार से पहले स्वराज की सोचो।' तो इसे तिलक-विरोधियों ने रूढ़िवादी वक्तव्य बतलाया। 

परिणामस्वरूप तिलक पर आलोचनाओं के अंगारे बरसाए गए। आग्रहग्रस्त लोगों ने तिलक को समाज-सुधारों का विरोधी कहा। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत थी। तिलक भी समाज-सुधार चाहते थे, लेकिन सलीके से। वैसे भी यह एक सनातन सत्य है कि विवेकपूर्वक और योजनाबद्ध ढंग से किया गया कार्य सफलता का रंग जमा देता है। सलीके से की गई कोशिश सफलता की सौगात देती है। 

यही कारण है कि तिलक ने समाज-सुधार के लिए एक निश्चित कार्ययोजना और उसके व्यवस्थित क्रियान्वयन की बात पर जोर दिया। वैसे भी कहावत है कि 'जल्दी का काम शैतान का।' कोई भी सुधार ताबड़तोड़ नहीं होता और होना भी नहीं चाहिए। तिलक-दर्शन के अध्येता के नाते मेरा मौलिक मत है कि समाज-सुधार किसी सड़क के उस 'पेंचवर्क' या 'मरम्मत' की तरह नहीं होना चाहिए जो किसी वीवीआईपी के आगमन पर किया जाता है और कुछ दिनों बाद ही पेंचवर्क का दम निकल जाता है।

अपितु समाज-सुधार उस हनुमानजी द्वारा लाई गई संजीवनी की तरह होना चाहिए जिसको सुंघाने से लक्ष्मण की मूर्च्छा समाप्त हो और स्थायी रूप से दम वापस आ जाए। लोकमान्य तिलक इसीलिए सलीके से, सुव्यवस्थित तरीके से समाज-सुधार चाहते थे जो स्थायी हो तथा जिससे समाज की 'दशा और दिशा' बदले। अगर तिलक समाज-सुधारों के विरोधी होते तो वे कभी भी आगरकर तथा चिपलूणकर के साथ मिलकर न्यू इंग्लिश स्कूल की 1 जनवरी 1880 में स्थापना नहीं करते। 

तिलक द्वारा अपने साथियों के साथ स्थापित किया गया यह स्कूल ही आगे चलकर 'डेकन एजुकेशन सोसायटी' के रूप में विकसित हुआ। यही नहीं तिलक ने बाद में आगरकर और आष्टे के सहयोग से फर्ग्यूसन कॉलेज खोल दिया था। 

शिक्षण-संस्थाएं प्रारंभ करने और कॉलेज खोलने की तिलक की तड़प से पता चलता है कि वे शिक्षा को ऐसा शस्त्र मानते थे जो विकारों को ध्वस्त करके सुधारों का पथ प्रशस्त करती है। लेकिन समाज-सुधार के लिए स्वराज आवश्यक है। यही कारण है कि तिलक ने समाज-सुधार के लिए स्वराज्य की पैरवी की। चूंकि तिलक ने समाज-सुधार से पहले स्वराज की बात की इसलिए विरोधियों ने आसमान सिर पर उठा लिया। जबकि वास्तविकता यह है कि समाज-सुधार के वाहन के लिए स्वराज की सड़क जरूरी है।

फोर्थ डिग्री कविता का फॉर्मूला


स्वीटराधिका राधे-राधे
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सारा पुलिस महकमा परेशान-हलकान था। अपराधी इतने शातिर और चट्टान की तरह मजबूत हो गए थे कि उन्हें कितना ही मारो-कूटो-पीटो, अपने जुर्म को उगलते ही नहीं थे। अपराधियों में अचानक आए इस परिवर्तन से कांस्टेबल से लगाकर होम मिनिस्टर तक आश्चर्यचकित थे। आखिर सभी अपराधियों का एकाएक शरीफ हो जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था। पुलिस का चिर-परिचित फॉर्मूला, थर्ड डिग्री फॉर्मूला भी छोटे-छोटे अपराधियों के सामने ही ऐसे औंधे मुँह धराशायी हुआ कि जीरो डिग्री से भी बदतर साबित हुआ। सरकार को भी सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या न करे। कुल मिलाकर यह मुद्दा पूरे देश के लिए अहम मुद्दा बन गया था।

जब चिल्ल-पौं मची तो हमेशा की तरह मामले से पीछा छुड़ाने के लिए आयोग गठित कर दिया गया। दस साल बाद आई आयोग की रिपोर्ट में अपराधियों से राज उगलवाने के दस रामबाण अचूक फॉर्मूले सुझाए गए थे। आयोग की रिपोर्ट से नेता, अभिनेता, जनता सभी इसलिए भी निश्चिंत और संतुष्ट थे कि पूरे एक साल में जब एक फॉर्मूला खोजा गया है तो वह रामबाण के साथ ही श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह भी होगा। 

उत्साहित पुलिस ने दृढ़ इच्छाशक्ति और पूरे शारीरिक व आत्मबल से आयोग के फॉर्मूलों को अपराधियों पर प्रयोग किया। पूरी मुस्तैदी के साथ क्रियान्वित किए गए एक से दस तक के फॉर्मूलों का अपराधियों पर ऐसा असर हुआ जैसे वे टीवी पर राजू श्रीवास्तव का लॉफ्टर चैलेंज शो देख रहे हों। हताश होकर सरकार ने अपना माथा ही नहीं हाथ, पैर, आँख, कान, जुबान सभी पीट लिए।

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एक कस्बे के थाने के टीआई सा. अपने ऑफिस में थके-हारे बैठे थे। दरअसल, उन्होंने एक शातिर और पुराने जिलाबदर अपराधी को बमुश्किल पकड़ा था और उसकी डेढ़ घंटे तक की गई धुनाई से लस्त-पस्त हो गए थे। टीआई साहब ने संतरी को कड़क मीठी चाय लाने का ऑर्डर मारा। इस देश के सौभाग्य से टीआई साहब कवि भी थे। संतरी ने जैसे ही गरमा-गरम चाय टेबल पर रखी, उन्होंने गटागट हलक में उड़ेल ली। मुँह में जर्दे का गुटका दबाते ही उनके शरीर से टीआई का पद तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट हो गया और उन्होंने कवि के पद पर अपनी आमद दर्ज करा दी।

टीआई साहब सर्वोतोन्मुखी प्रतिभा के धनी कवि थे। सभी रसों की काव्य-सर्जना में उनका समान रूप से अधिकार था। कवि के पद पर ज्वाइनिंग रिपोर्ट देने के बाद उन्होंने आठ-दस कविताएँ लिख डालीं। टीआई साहब कविता लिखने के बाद ऐसे खुश, जैसे उन्हें एसपी बना दिया गया हो। थोकबंद कविताएँ लिखने के बाद आम कवियों की तरह उनके मन में उन्हें किसी को सुनाने की लहरें उठने लगीं। थाने के पूरे स्टाफ को तो वो अपनी कविताओं से बरसों से बोर कर रहे थे। टीआई ने सोचा, इन ताजी रचनाओं को किसी श्रोता को तुरंत सुनाना जरूरी है नहीं तो ये बासी हो जाएँगी।

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काफी देर के चिंतन-मनन के बाद सुयोग्य श्रोता की तलाश में उनका मन थाने में बंद उस अपराधी की ओर जा अटका, जिसकी उन्होंने धुनाई की थी। साला! मेरी कविता सुनेगा तो झक मारकर दाद भी देगा और ताली भी बजाएगा। टीआई साहब ने लॉकअप का ताला खुलवाया और रचनाओं सहित अंदर जा धमके। सहमा अपराधी खड़ा हो गया। टीआई साहब बोले! बंधु! कुछ ताजा कविताएँ पेश हैं। 

मगर यह क्या, अपराधी जैसे-तैसे तीन कविताएँ झेलने के बाद ही लाइन पर आ गया और बोला बस! बस!! टीआई साहब मुझे चौथी कविता मत सुनाइए। मैं आपको सब कुछ सच-सच बताता हूँ। बेचारे अपराधी ने फटाफट जुर्म का इकबाल कर लिया। फिर क्या था... टीआई साहब की फोर्थ डिग्री कविता का फॉर्मूला उन सभी थानों में लागू कर दिया गया, जहाँ पदस्थ टीआई होने के साथ ही कवि भी थे। अब सरकार नए थानेदार की भर्ती हेतु अनिवार्य योग्यता में कवि होना जरूरी कर रही है। कविता अपराधियों पर भी असर करती है, ये लोगों ने पहली बार जाना।  

लड़के-लड़कियों की अलग पढ़ाई


SWEETIE RADHIKA RADHEY-RADHEY  *
अमेरिका में अब फिर से लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग क्लासरूम लोकप्रिय हो रहे हैं। नए शोध में पाया गया है कि अलग-अलग रखने पर लड़के और लड़कियाँ न केवल आराम से खाते हैं, बल्कि पढ़ाई और आदतों पर भी अच्छा असर हुआ।

80 से 90 के दशक में भारत में को एजुकेशन यानी लड़के-लड़कियों के लिए एक साथ पढ़ाई इतनी लोकप्रिय हुई कि यह फैशन में तब्दील हो गई। अब पटरी फिर पुराने दिनों कि ओर लौट रही है क्योंकि शिक्षाविदों को समझ में आ रहा है कि अलग-अलग रखने पर लड़के और लड़कियों में काफी अच्छे बदलाव देखे गए हैं।

अमेरिका के कैंसास सिटी के तीन स्कूलों में छात्रों के बीच दुर्व्यव्हार को कम करने के लिए लड़के और लड़कियों को अलग-अलग लंच देना शुरू किया गया है। नतीजा सामने आया कि लड़के और लड़कियों दोनों की खाने की आदतें सुधरी। कैंसास का मिडिल स्कूल द विषेटे में 11 से 14 साल के लड़के-लड़कियों के लिए अब खाना अलग-अलग होता है। 

छात्रों के बीच छेड़खानी कम करने के लिए यह कदम उठाया गया है। प्लेजेंट वैली मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक माइकल आर्किबेक कहते हैं, 'लड़कियों को यह बहुत पसंद आ रहा है क्योंकि लड़कों के बगैर उनके पास अपने लिए समय होता है और लड़के भी लड़कियों को रिझाने के लिए अतिशयोक्ति नहीं करते। मुझे लगता है कि इस उम्र के लिए एकदम सही तरीका है।' 

लेकिन प्रधानाध्यापक को सबसे अच्छी बात तो यह लग रही है कि वह बच्चे अपना खाना पूरा खत्म कर रहे हैं। इसका मतलब कि खाना फेंका नहीं जाता और बच्चे भूखे पेट पढ़ाई नहीं करते। 'मुझे विश्वास ही नहीं होता कि इतने बच्चे अब खाना खा रहे हैं।' 

वहीं विषेटे के ट्रूसडेल मिडिल स्कूल में पिछले दो साल से लड़के और लड़कियों के लिए दोपहर का भोजन अलग-अलग होता है। प्रिंसिपल जेनिफर सिनक्लेर कहती हैं कि इसका अच्छा असर बाद में भी इन बच्चों पर देखा जा सकता है। सिनक्लेर कहती हैं कि बच्चों को यह पसंद भी आ रहा है क्योंकि हाल ही में जब साथ में खाने का प्रस्ताव रखा गया तो बच्चों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। 

कैंसास के शिक्षा विभाग के प्रवक्ता का कहना है कि सिर्फ विषेटे में ही इस तरह के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। वैसे अमेरिका में लड़के और लड़कियों की अलग पढ़ाई धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है क्योंकि सामने आया है कि ऐसा करने से बच्चे पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देते हैं और उनके सामाजिक व्यव्हार में अच्छा बदलाव आता है। 
जनवरी 2011 में कम से कम 524 अमेरिकी पब्लिक स्कूल ऐसे थे जहाँ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग कमरे थे। जबकि 2002 में ऐसे एक दर्जन स्कूल भी नहीं थे

Wednesday, August 17, 2011

बिनु हिंदुत्व भारत मृत सी काया . मृत है देश ,मृत जन-मानष चीन्हो !



बिनु हिंदुत्व बौरी भई जनता 
राष्ट्र अखंड बिभाजन कीनो 
पाकिस्तान सो शत्रु कीन्हो 
लूट मचाई शेष देश में 
पंगु अखंड मंडल करि दीन्हो  
स्वाभिमान को भूल गए सब 
पिट-पिट कर लालच मन लीन्हो 
राम-श्याम-शिव छोड़ के बन्धु 
कैसो भ्रम धर्म-निरपेक्ष चीन्हो 
सत्तासीन लुटेरे डाकू 
तौ कैसे होय सुख से जीनो 
गुजरात प्रान्त समृद्धि सब सम्मुख 
हिंदुत्व ही सबको सुख दीनो  
जाति-आरक्षण तृष्णा स्वारथ 
मृग मरीचिका न कोई सुख कीन्हो 
एकता हिन्दू मात्र की होवे 
सत्य-वचन मम तव ही भलो होन्हो 
"स्वीट राधिका " हेरत-टेरत 
हिंदुत्व ही या देश को गहनो 
बिनु हिंदुत्व ये मृत सी काया 
मृत है देश मृत जन-मानष चीन्हो  


जयहिंदुत्व -जयभारत    

Tuesday, June 28, 2011

कृष्णं वन्दे जगद गुरुम !



जय-जय  श्री राधेश्याम  !!
जय-जय श्री सीताराम !!
सभी मित्रों-भक्तों-संतों एवं आचार्यों को मेरा यथा योग्य सादर प्रणाम-नमस्ते !
बहुत सा चिंतन-मनन-स्वाध्याय एवं समकालीन घटनाक्रम पर दृष्टिपात करते हुए मेरे मनो-मस्तिष्क में प्रस्तुत विचार कई दिनों से आरहे हैं कि कैसे मेरे महान सनातन धर्म एवं संस्कृति का उद्धार हो-एकता हो ?, कैसे मेरे महान भारत राष्ट्र की उन्नति हो ? , कैसे मेरे देशवासी सम्पन्न-सुखी एवं अभय हों ?
मैंने इस हेतु ऑरकुट पर विगत एक बर्ष से बहुत लिखा है ! विभिन्न कम्युनिटीयाँ -जय हिंदुत्व - जय भारत , 
जय श्री राधे, रामचरितमानस ,श्री बाँके बिहारी लाल आदि एवं ब्लॉग हिंदुत्व,राधे-राधे ,mycountry -my wishes ,रामचरितमानस ,हरेकृष्ण ,वन्दौ ब्रज बसुन्धरा आदि पर निज धर्मं-संस्कृति एवं राष्ट्र सेवा में लिख रही हूँ !
विगत कुछ माह से मैंने facebook पर भी प्रोफाइल प्रारंभ कर लिखना आरम्भ किया है ! यहाँ कई नोट ,पेज एवं इवेंट संचालित किये हैं ! जैसा कि आपने अनुभव किया होगा मेरा social -networking का  एक मात्र  उद्देश्य अपने धर्मं-संस्कृति-राष्ट्र की गुणता बखान करना एवं इनके चरमोत्कर्ष की अभिलाषा करना है ! इस यात्रा में मुझे अनेकों अनुभव हुए , बहुत सी जानकारियाँ प्राप्त हुयीं ! मैंने पाया अधिकांश जन-मानस धर्मं-राष्ट्र के प्रति समर्पित-जागरुक  है परन्तु साथ ही साथ कुछ भ्रमित भी ! इसी भ्रम के निवारणार्थ मेरा ह्रदय मुझे लिखने के लिए प्रेरित कर रहा है कि किस प्रकार हम समूचे सनातनी-भारतीय अपनी खोयी आभा को प्राप्त कर स्वाभिमानी बनें ! जो आज कल कहीं नहीं दिखता पाश्च्यात चका-चोंध में भारतीय स्वाभिमान सूखाग्रस्त हो मुरझा कर बिष को अमृत-जीवन आश समझ पगला गया है ! आइये कुछ सोपान तय करें कि कैसे हम पुनः जगदगुरु की गरिमामयी छवि को प्राप्त करे !

 - (प्रथम - सोपान) -
साथियों ,, मुझे आश्चर्य हुआ जब मुझे अनेकों लोगों ने लिखा कि हिन्दू कोई धर्म नहीं ,, बहुतेरे हिन्दू शब्द आयातित बता रहे थे ! मेरा उनसे निवेदन है कि महान सनातन धर्मं ही हिन्दू धर्मं है ,, हिन्दू आयातित नहीं शुद्ध वैदिक-पौराणिक शब्द है (गीता प्रेस गोरखपुर का हिन्दू अंक देखें वहां अनेकों विद्वानों के अनेकों लेख इस दिशा में आपको प्राप्त होंगे ) और यदि यह आयातित भी है तो आज हमारी विश्व में पहचान है ! जब आप भारत को इण्डिया बोल सकते हैं तो सनातन को हिन्दू बोलने में क्या आपत्ति !
(द्वितीय  -सोपान ) ---  बहुतेरे लोगों ने लिखा वे हिन्दू नहीं हैं वैष्णव है आश्चर्य हुआ कि हिन्दू से वैष्णव धर्म कब अलग हुआ ! मेरे कहने पर कि हिन्दू धर्म-दर्शन  की एक शाखा  वैष्णव धर्म-दर्शन है तो वे बिगड़ गए बोले हमारे गुरुओं ने तुम्हारा ये पुराना खोखला झूंठ सिद्ध कर दिया है कि भगवान विष्णु का अवतार भगवान कृष्ण हैं जबकि भगवान कृष्ण ने ही विष्णु अवतार लिया है ! मेने उनसे कहा भैया कब मैंने भगवान के अवतार की बात की तो वे और भड़क गए  बोले सनातन -हिन्दू कोई धर्मं नहीं केवल भगवान कृष्ण ही भगवान हैं शेष डेमी गोड हैं ! मेने उनसे कहा क्यों धर्मं का नाश करने पर तुले हो ? क्यों संप्रदाय बाद के नाटक में महान सत्य को बादल बन ढक रहे हो ? ,, क्यों इस महान संस्कृति के सूर्य को राहु सदृश डसने को आतुर हो ?
उसके बाद उनको मेने मित्र सूचि से निकल दिया तव वे मुझे मेसेज कर कहने लगे की में अपने झूंठ से उनके सत्य के सामने डर गयी हूँ इसलिए उन्हें रिमूव किया ,,
हार कर उनकी राक्षसी वाणी को न सुनने के मन के कारण उन्हें ब्लोक कर उनकी वीभत्स सोच से राहत पाई ! 
( तृतीय-सोपान ) ----  मैंने इवेंट जय हिंदुत्व -जय भारत पर लिखा था कि महान हिन्दू धर्मं की बौद्ध-जैन-आर्य समाज -सिख इत्यादि संतानें हैं ! जिसका स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो धर्म-सम्मलेन में उल्लेख किया था ""मैं उस धर्मं का प्रतिनिधित्व करता हूँ जो विश्व के महान बौद्ध धर्म की माँ है "" पर एक कथित हिन्दू आकर वहस छेडने लगा की बौद्ध-जैन ये अलग धर्मं हैं क्योंकि विचार-धारा हिन्दू धर्मं से भिन्न है और वह बुद्ध का बहुत आदर करता है ! 
मैंने उसे बोला भगवान रिषभ देव(जैन धर्मं के संस्थापक) भगवान बुद्ध(बौद्ध धर्मं के संस्थापक)  श्री मद भागवत एवं अन्य पुराणों के आधार पर भगवान विष्णु के ही अवतार हैं ! 
तो वह हठधर्मिता दर्शा इसे झूंठ करार देने लगा ! 
मैंने उसे बोला कि बौद्ध दर्शन की हीनयान शाखा  बुद्ध को भी भगवान नहीं मानती परन्तु महायान शाखा बुद्ध को भगवान मानती है यहाँ भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है तव  वो सज्जन अकड़ दिखाने लगा मनुबाद कह कोसने लगा फल-स्वरुप ब्लोक करना पड़ा !
(चतुर्थ-सोपान)-----  ऑरकुट-फेसबुक सभी जगह भगवान के सुन्दर-सुन्दर चित्र लगा बड़ी-बड़ी कविता-गीत    लिख भक्ति प्रदर्शित करने वालों  ने इवेंट जय हिंदुत्व -जय भारत  पर रंच   मात्र भी रूचि   नहीं दर्शाई ! मुझे लगता है ये अपने को भक्त मान इस दीन-दुनिया से परे समझते होंगे (वैसे ये लड़कियों से खूव चुटकले आदान-प्रदान करते रहते हैं ) मेरा इनसे कहना है कि विनु हिंदुत्व के अन्य किसी कथित धर्मं में ये ऐसे भजन कर पाएंगे ! हिंदुत्व का सशक्त होना भी भजन-भक्ति करने के लिए परमावश्यक है !
एक सज्जन मुझे आकर वोलने लगे क्यों मैं आग झोंक रही हूँ इवेंट के रूप में -कृपया मुझे बताएं कोई अपने स्वजनों को उनके पूर्वजों की विरासत समझाये तो क्या यह आग है ?? मैंने अब तक किसी अन्य कथित धर्मं का तो नाम नहीं लिया न ?? किसी जेहाद या क्रुसेड के लिए तो लोगों को भड़काया नहीं ??फिर कैसी आग ?? वो व्यक्ति मुझे बोला की वह सब धर्मों का है तो मुझे इससे क्या उसके माता-पिता को फर्क पड़ेगा की उनका बेटा सर्व धर्मों का है अब उनके देहावसान पर उन्हें चिता देगा या कब्र ,, उनकी अस्थियों को गंगा ले जायगा या काबा ,, वो कथित सर्व धर्मी किसी और धर्मं के अनुयायी से अपनी बहन-बेटी का विवाह करना चाहेगा क्या ??
अंतकाल में गंगा जल की जगह काबा या येरुशलम का पानी अपने मुंह में डलबायेगा क्या ?  
मुझे पता है कोई भी अपने धर्म को नहीं छोड़ता ,, क्षुद्र स्वार्थ वश प्रचार करते हैं केवल !
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में सुझाया है ""स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मो भयावह ""
 (पंचम-सोपान)----एक दिन बहुत से व्यक्ति पूछने आये क्यों कर भगवान श्री कृष्ण के साथ श्री राधा रानी की श्री विग्रह मंदिर में होती हैं ,, माता रुकमनी की क्यों नहीं ,, उन लोगों ने भगवान एवं माता न लिख सीधे नाम लिख डाले तिस पर मुझे अत्यंत रोष हुआ मैंने उन्हें आदर से भगवद नाम लेने को बोला !!
कृपया भगवान के नाम-धाम-लीला दिव्य हैं , कृपा कारी हैं ! इनकी गरिमा बनाये रखें ,, इनके साथ किसी भी प्रकार की मुर्खता-छेड़ छड असह्य है  !
(षष्ठ-सोपान)------   मित्रो इन सब बातों पर  मैं बहुत से नोटों में लिख चुकी हूँ आगे भी लिखती रहूंगी -
आप फेसबुक ,ऑरकुट ,ब्लॉगर इत्यादि पर सम्बंधित सामिग्री प्राप्त कर सकते हैं --
यहाँ मेरा आज का लेख अपने महान धर्मं-राष्ट्र एवं संस्कृति की उन्नति के साधनों पर चर्चा करना है -
१--राष्ट्र की उन्नति केवल एक उपाय से ही संभव है , इसे धार्मिक बना दिया जाय ! हिन्दू भारत स्वयं ही सर्वोन्नती कर  सकने में सक्षम है ! हिंदुत्व भारत राष्ट्र  की आत्मा है ,, आज बिना हिंदुत्व के भारत पंगु सदृश है !
२- महान हिन्दू धर्मं की रक्षा-सेवा में भी केवल एक मात्र उपाय पर्याप्त है कि सभी लौकिक गुरुओं-धार्मिक प्रवक्ताओं-संस्था-ट्रस्टों की पूजा बंद कर इनकी अकूत सम्पदा जब्त कर निर्धन हिन्दू मात्र के कल्याण में लगा दिया जाय ! संयोग से निकट ही श्री व्यास पूर्णिमा का शुभ पर्व आने वाला है ! जिस दिन गुरु पूजा की जाती है !
संयोग से आज के समय कोई भी प्राणी गुरु कहलवाने /पूजा कराने के योग्य नहीं है ,, केवल पूर्व संत-भक्तों-महा पुरुषों में से  निज रूचि के अनुसार किसी भी को  गुरुदेव मान  कर पूजा करें ! आप श्री चैतन्य महाप्रभु या नित्या नन्द महाप्रभु जी या कोई भी षड गोस्वामी जन से या भक्ति सिद्धांत  सरस्वती पाद से या प्रभु पाद जी से दीक्षा ले सकते हैं ! आप गोस्वामी संत श्री तुलसी दास जी को भी अपना गुरु स्वीकार सकते हैं या आप श्री वल्लभाचार्य जी श्री विठठल जी या कोई भी अष्ट छाप संत-भक्त से या भक्ति मति मीरा बाई जी से सीधे दीक्षा ले धन्य हो सकते हैं !यही सर्वोत्तम है ! 
लौकिक गुरु की विभिन्न कमियों पर दृष्टि पात होने पर ,, उसकी कमियां स्वयं में आ जातीं हैं ! 
और आजकल ठग एवं चालक लोग मंच से वैठ  चेला-चेली बनाने का अभियान चलते हैं ! जो सरासर गलत है ! पतन की ओर ले जाने वाला है ! प्रातः स्मरणीय ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुख दास जी महाराज ऐसे ही संतों में से एक थे जो न तो अपनो कोई फोटो खिंचवाते या पुजवाते थे ! न ही अपने नाम से आगे परम श्रद्धेय जैसे संबोधन लगवाते-लिखवाते थे ! स्वामीजी अपने चरण स्पर्श भी नहीं कराते थे ! संगीत धुनों पर प्रवचन में माता-वहनों से नाच भी नहीं नचवाते थे ! स्वामी जी ने किसी को भी अपना चेली-चेला नहीं बनाया ! स्वामी जी आश्रम-मठ बनाने के भी खिलाफ रहे उन्होंने जीवन में कोई भी आश्रम-मठ-कुटिया नहीं बनायीं ! स्वामी जी दान भी नहीं लेते थे ! विस्तृत जानकारी के लिए गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गीता-दर्पण पढ़िए ! आप स्वामीजी द्वारा लिखित एक छोटी सी पुस्तक मूल्य अधिकतम ५/-रु. होगा   ""क्या गुरु बिन मुक्ति नहीं"" अवश्य पढ़ें  ये आपकी गुरु विषयक सभी जिज्ञासाओं को शांत कर देगी !
आजकल के गुरु सिष्य अंधे-बहरे के समान हैं  - जैसा श्री रामचरितमानस में वर्णित है !
गुरु-सिस अंध बधिर कर लेखा ! एक न सुनहिं एक नहीं पेखा !!
लोभी गुरु लालची चेला-होय नरक में ठेलम ठेला !!
अतः कृपया लौकिक गुरु नहीं बनायें ये तथाकथित गुरु संप्रदाय बाद-निज मतबाद आदि के भ्रम फैला धर्म को हानी  पहुंचाते हैं ! 
ये पर उपदेश कुशल बहुतेरे ! जे आचरहिं ते नर न घनेरे 
के अनुसार हैं  !   
इनको गुरु बनाना नरक में सीट पक्की करना है ! इनको या इनके किसी उपक्रम को दान देना शुद्ध ठगी है ! इनकी पूजा कर प्रसादी लेना साक्षात् नरक है !
ये एयर कंडीशन कमरों-गाड़ियों-पंडालों में रहने वाले क्या भक्ति-ज्ञान करेंगे ! इनके कुनवे मूर्खों की मुर्खता से बिनु  क्रिया-कर्म राजशी ठाठ भोगते हैं !
ध्यान रहे कभी दान करना भी हो तो बिना किसी तीसरे प्राणी के स्वयं के निरिक्षण में किसी विद्यालय-देवालय-चिकित्सालय-अनाथालय-ब्रिद्धालय या गौ शाला में जाकर दान करें -दान के मद में कार्य करा खर्च करें ! इससे आपका दान यथार्थ होगा ,प्रभावी फलदायी होगा !
ये मंद बुद्धि कथित गुरु नए-नए पागल पंथी ठगी संप्रदाय बना भोले-भले जन मानस को लुटते/शोषण करते हैं !
३- भारतीय जनता/जन-मानश का लाभ केवल एकता में है ! जहाँ जाति-पंथ वर्ण भाषा या स्थानीय कोई  भी भेद-भाव न हो सब हिन्दू हों -सब भारतीय हों ! ""संघे शक्ति कलियुगे"" ये आदर्श महत सन्देश सदैव स्मृत रहे !
(सप्तम - सोपान )----  याद रखें ''हतो एव हन्ति-धर्मो रक्षति रक्षितः'' धर्मं की रक्षा करने पर धर्म हमें रक्षक छत्र प्रदान करता है ! जबकि नष्ट करने पर धर्म समूल नष्ट कर देता है ! अतः हमारा परम कर्तव्य एवं लाभ है सभी प्रकार से निज धर्म-निज राष्ट्र एवं निज संस्कृति की सेवा करें !  
एक और कथित वैष्णव परिवार मुझे मेरी प्रोफाइल पर मेरा फोटो न होने पर मिथ्यामार्गी आदि बोलने लगे ,, मैंने उन्हे समझाया किसी के भी लिए अपनी निजता facebook  पर भंग करना चूक होता है ! 
आपके स्वयं के फोटो से कभी भी कोई भी आपकी हास्यास्पद स्थिति बना सकता है !!
उसे उसकी वैष्णवता का दर्पण दिखा मैंने उससे बाय-बाय किया !! 
आप भगवान श्री कृष्ण -भगवान श्री राम या भगवान श्री शंकर  को भी सीधे गुरु मान सकते है ! 
कृपया ध्यान दें गुरु बनाये नहीं माने (स्वीकारे) जाते हैं !
पाखंडी को गुरु मानने पर लोक व परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं !
अतः अच्छा है किसी पूर्व के संत -भक्त को गुरु मानें या सीधे भगवान को गुरु मान लें !
हनुमान जी भक्ति-ज्ञान मार्ग पर सर्व श्रेष्ठ गुरु हैं !
कृष्णं वन्दे जगद गुरुम !
जय हिंदुत्व  -जय भारत     
नमः पार्वती पत्ये हर-हर महादेव   
उपरोक्त आलेख  मैंने भगवान श्री राम के भक्ति प्रदायी महाकाव्य श्री रामचरितमानस के आधार पर सप्तम सोपान में बिभाजित किया है ! मेरी कामना है की भक्तबांछा कल्पतरु भगवान श्री रघुनन्दन अजिर बिहारी भगवान श्री राम मुझ पर अपनी अपरिमित -अहैतुकी कृपा आशीर्वाद बनाये रखें !!