'राधे-राधे' स्वीटी राधिका 'राधे-राधे'
मित्रो ,
जैसा आपको पता है कि फरबरी माह चल रहा है , आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारण,बाजार में-समाज में कुछ पाश्च्यात्य हवा वह रही है ! वेलेंटाइन जैसे पर्वों का चलन जोरों पर है,जिस पर विभिन्न राजनेता- समाज सुधारक-धर्मं प्रचारक विभिन्न वक्तव्य दे-दे कर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों से लिखने की लालसा में,आंधी की तरह गरज-गरज कर समाज को, लोगों को डरा रहे हैं,
यद्यपि प्रेम इस गर्वित संस्कृति की रग-रग में विद्यमान है !
इस फरवरी (माघ मास में ) के साथ ही भारत में भी प्रेमोत्सव के रूप में मदनोत्सव मनाया जाता है !
माता सरस्वती का आशीर्वाद लेकर ,
प्रेम बर्षा होली का आधार स्थापित कर दिया जाता है !
जोकि संपूर्ण विश्व में मनाये जाने वाले किसी भी प्रेमोत्सव से महान है !
कोई कहता है कि भारत में वेलेंटाइन को माता-पिता की पूजा कर मनाओ , कोई कहता है मनाने वालों पर डंडे चलाओ !
अरे ! ये कहो, विदेशी आयातित रूप छोड़ अपना महान स्वदेशी स्वरुप वसंत-होली पर्व मनाओ !
और विश्व में लिख दो कि "सबसे आगे हैं हिन्दुस्तानी "
और रही इन भाषण-वक्ताओं की बात तो ये बिल्ले हैं ,
सामने म्याउँ-म्याउँ कह संत बनेंगे ,
मन से तुम्हारी संपत्ति आदि पर डकैती डालने को उत्सुक हैं !
हरेकृष्ण !
कृपया वेलेंटाइन दिवस के नाम पर व्यर्थ में हो-हल्ला न करें !
इसके पक्ष या विपक्ष के गुटों से इसका प्रचार ही होता है !
महान हिन्दू संस्कृति में प्रतिदिन माता-पिता-गुरु के चरण स्पर्श का महान परामर्श पहले से ही है ! कोई नए दिन वो भी १४ फरबरी को बिशेष रूप से इसे आयोजित कर , एक प्रकार से हम १४ फरबरी को महिमा से अलंकृत कर प्रचारित करेंगे ,
कि कोई वेलेंटाइन दिन है जिससे डरकर हम माता-पिता की पूजा करते हैं !
भाइयो, अपने देश में ८०% जन समूह इन वेलेंटाइन दिनों से अनभिज्ञ है, क्यों व्यर्थ में हल्ला कर इनको आगे बढ़ाते हो !
हाँ ,भारतीय संस्कृति कभी भी प्रेम के विपरीत नहीं है ! हम महान आर्य विश्व में दर्शन गुरु हैं ! हमारे यहाँ भी वेलेंटाइन से कहीं आगे , वसंत उत्सव मनाया जाता है ! वसंत अर्थात कामदेव , सीधा अर्थ है काम उत्सव, 'मदनोत्सव' और ये भी माता शारदा की पूजा कर आशीर्वाद से होली तक मनाया जाता है !
मित्रो, होली इस उत्सव की अद्भुत प्रेम बर्षा है ! जब पहले से ही एक महान उत्सव हमारी संस्कृति में है जिससे १००% भारतीय परिचित हैं तो क्यों कर हम किसी आयातित उत्सव में रूचि लेंगे !
मेरी सभी नेताओं-प्रचारकों से विनती है भारतीय जन-मानष स्वयं में जागरुक है , अपना अच्छा- बुरा जानता है !
आप कृपया व्यर्थ में श्रम न करें, अपने घर को सुधारें-अपने आप को सुधारें
और मित्रो,
हमारी संस्कृति को किसी से खतरा नहीं है , यदि खतरा है तो केवल
स्वयंभू ढोंगी धर्मं-गुरुओं, नेताओं ,लालची जन-समूहों एवं मूर्ख-अंध अनुयायियों से जो गिद्ध की तरह भोली-भाली जनता का माँस नोंचते हैं तथा धर्मं एवं आस्था को घायल करते हैं !
हरेकृष्ण !
देखिये समाज में एक गति होती है जो समय के सापेक्ष परिवर्तित होती रहती है, इसे आप गति-शील समाज भी कह सकते हैं ,
जिन समाजों में परिवर्तन दर नहीं होती ,वे समाज गतिहीन समाज कहलाते हैं ! मृत समाज होते हैं !
समाज अपना अच्छा-बुरा स्वयं निर्णय कर सकता है ! समाज के ऊपर अच्छा-बुरा थोपना तालिवानिकरण है ,
जो अंततः समाज को खा जाता है !
हिन्दू धर्मं कभी कट्टर नहीं रहा ! हिन्दू संस्कृति परम उदार है -
यह सर्वत्र "सार -सार को गहि रहे थोथा देहि उड़ाय " नियम से-
शुभ-शुभ एकत्र कर निरर्थक को मल सद्रश फेंक देती है !
रही बात वेलेंटाइन की तो इसे माता-पिता के लिए मनाने पर कुछ वढेगा नहीं तथा प्रेमियों के लिए मनाने से कुछ घटेगा नहीं !
और भारतीय एवं पश्च्यात दोंनों जगह मातृ दिवस-पितृ दिवस मनाने का अलग से विधान एवं समय है !
जो प्रेमियों के नाम है उसे प्रेम में ही समर्पित करें !
कैसा होगा यदि घोषित कर दें कि होली केवल अपने माता-पिता से खेलो !
मित्रो ये करो-ये सलाह है -ये बड़ा बुरा है-ये अच्छा है -ये ईश्वर का बिशेष प्रतिनिधि है - ये सब मायिक वाक जाल हैं जिनको लोग रच-रच कर स्वयं की प्रसिद्धि हेतु प्रचार-व्यापार करते हैं !
ऐसे लोगों के लिए श्री रामचरितमानस में कहा गया है -
"पर उपदेश कुशल बहुतेरे ! जे आचरहिं ते नर न घनेरे !!"
इनकी कथनी कुछ और एवं करनी कुछ और है !
"ये राम नाम जपना ,पराया माल अपना ! भाव वाले हैं !"
इनके लिए ईश्वर प्रेम या समाज सेवा ऐसा कोई भाव नहीं होता !
मित्रो,
अच्छे व्यक्ति दिखावा नहीं करते ,
उनके लिए प्रचार कोई मायने नहीं रखता !
वे शहर-शहर अपने होर्डिंग्स नहीं लगवाते !
वो स्त्रियों के समूह अपने पीछे-पीछे लगाकर नहीं घूमते !
चेले-चेलियों की संख्या नहीं बढ़ाते !
सुरक्षा गार्डों के साये में नहीं घूमते !
किसी का ह्रदय नहीं दुखाते , कटु शब्दों का प्रयोग नहीं करते !
अपने द्वारा या चेले-चेलियों एजेंटों के द्वारा स्वयं को चमत्कारी महात्मा नहीं सिद्ध करते/कराते हैं !
ये समाज के लिए जीते एवं करते हैं, स्वयं दुःख सहकर भी परदोष ढकते हैं
यथा-"जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा " जिनका ह्रदय दूसरे का दुःख समझ द्रवित हो वह जाता है , माखन से भी अधिक कोमल ह्रदय जिनके होता है!
जैसे -गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज श्री रामचरितमानस में उल्लेख कर रहे हैं -" संत ह्रदय नवनीत समाना ! कहा कविन्ह पर कहिय न आना !"
"निज परिताप द्रवइ नवनीता ! पर दुःख द्रवइ संत सुपुनीता !!"
अपने वेटे-वेटियों-कुटुम्बियों के लिए धन-माया एकत्र नहीं करते !
"सियाराम मय सब जग जानी भाव" रख 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की प्रार्थना कर , 'तेरी खुसी में ही मेरी खुसी है ' की निराली मस्ती में रहते हैं , ये अपनी पूजा न करा कर , अपने को गुरु न बताकर ,भगवान दत्तात्रेय की भाँति जगत से शिक्षा लेते हैं , जगत को अपने प्यारे करुणानिधान भगवान श्री श्याम-सुन्दर सीताराम समझ तुलसी दास जी की तरह प्रणाम करते हैं !
"करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी "
मित्रो ,
पाखंडी स्वघोषित गुरुओं-संतों-भक्तों की पूजा-सेवा करना भी पतन का कारक है ! ऐसे लोगों के भाषण-आख्यानों में जाना भी महापाप है, जिसका फल आपको तत्काल , आपके अमूल्य धन-समय की बर्बादी के रूप में मिलता है ! इन कालनेमि सदृश राक्षसों की संगति से आपकी भगवान के प्रति आस्था भी कम होती है ,जोकि परम दुर्भाग्य की शुरुआत है ! ये ढोंगी आपको डरा-धमका कर दान आदि की कहानियों से ठगी करते हैं , आपकी आस्था से खिलबाड़ कर आपको गर्त में डाल स्वयं मलाई खाते हैं ,
ये मायावी ठग बड़े ही मीठे-मीठे वचनों से आपको चूना लगाते हैं !
मेरा निवेदन है कि ऐसे धर्मगुरुओं-नेताओं-पाखंडियों को----
जिन्होंने अपना जमा धन -संपत्ति, जो लोगों को मूर्ख बना-बना कर एकत्रित की है ! स्वयं को ईश्वर का बिशेष प्रतिनिधि घोषित कर पाप कर्म किये हैं ! जिन्हें बिना ऐ.सी. के नींद नहीं आती है ! जिनके घर राज-महल जैसे ऐश्वर्यों से भरे हैं , पर वे इसे कुटिया कह लाज नहीं करते ! इनके पास लक्जरी कारों कि अनगिनित संख्या है ! प्रत्येक शहर में इनके बंगले नुमा आश्रम हैं ! फिर भी ये परम विरक्त हैं ! ये अपने पोज बड़े अंदाज में खिंचाते हैं कि मोडल भी इनसे शिक्षा लेलें फिर भी ये अकिंचिन हैं ! इन धर्म गुरुओं, नेताओं की बिगडैल औलाद सभी कुत्सित कर्मों में संलग्न है फिर भी इन्हें लोगों को उपदेशित करने में शर्म नहीं आती ! ये 'मुँह में राम बगल में छुरी' रख शिकार करते हैं ! नाच-गा कर विभिन्न ढोंग कर इनका माफिया राज चलता रहता है ! पैसे को व्याज पर देते हैं , भूमियों को कब्जाते हैं, छोटे-छोटे नावालिग़ वच्चों का शोषण-हत्या इनके लिए मच्छर मारने सदृश है ! फिर भी ये ईश्वर हैं अपने चेलों को सलाह देते हैं कि इनके फोटो कि पूजा ईश्वर कि मूर्ति के पास रखकर ईश्वर से भी पहले की जाय !
इनको यदि किसी भी नियुक्त दिवस पर सार्वजनिक रूप से धुना जाय तो वो भारतीयों का शौर्य-दिवस होगा !
मित्रो,
ये किसी एक के लिए व्यक्तिगत नहीं ये सभी "भेड की खाल में छुपे भेड़ियों के लिए है " !!
जो मूर्ख जन-मानस का शिकार कर अपना पेट भरते हैं !!
!! हरेकृष्ण-हरिबोल !!
!! राधे-राधे स्वीट राधिका राधे-राधे !!